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भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का संघर्षपूर्ण जीवन, राजनीति और विरासत गाथा

INDC Network: जीवनी:-भारत की राजनीति में कुछ ऐसे नेता हुए हैं, जिन्होंने सीमित समय के लिए सत्ता संभाली, लेकिन अपने व्यक्तित्व, वैचारिक स्पष्टता और साहसिक निर्णयों से स्थायी छाप छोड़ी। ऐसे ही नेताओं में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। वे भारत के 8वें प्रधानमंत्री थे और 10 नवंबर 1990 से 21 जून 1991 तक देश के सर्वोच्च पद पर आसीन रहे। उनका कार्यकाल भले ही अल्पकालिक रहा, लेकिन उनका राजनीतिक जीवन संघर्ष, सिद्धांतों और जनसमर्पण से भरा रहा।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

चंद्रशेखर का जन्म 1 जुलाई 1927 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के इब्राहिमपट्टी गांव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ। ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े चंद्रशेखर ने बचपन से ही सामाजिक विषमताओं और आर्थिक कठिनाइयों को करीब से देखा। यही अनुभव आगे चलकर उनके समाजवादी विचारों की नींव बने।उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा बलिया में प्राप्त की। इसके बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर (एम.ए.) की डिग्री हासिल की। इलाहाबाद विश्वविद्यालय उस समय राजनीतिक चेतना और वैचारिक बहसों का केंद्र माना जाता था। यहीं से उनके राजनीतिक जीवन की दिशा तय हुई।

समाजवादी विचारधारा से जुड़ाव

छात्र जीवन से ही चंद्रशेखर समाजवादी आंदोलन से प्रभावित थे। वे प्रख्यात समाजवादी नेता आचार्य नरेंद्र देव और राम मनोहर लोहिया के विचारों से प्रेरित थे। उन्होंने समाजवाद को केवल राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और समानता का माध्यम माना।1950 के दशक में वे प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े और जल्द ही एक तेजस्वी युवा नेता के रूप में उभरे। उनकी ओजस्वी वाणी और वैचारिक स्पष्टता ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।

कांग्रेस में प्रवेश और ‘यंग तुर्क’

1960 के दशक में चंद्रशेखर कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए। वे 1962 में राज्यसभा सदस्य बने। कांग्रेस में रहते हुए उन्होंने इंदिरा गांधी के नेतृत्व के दौरान कई नीतिगत मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रखी।वे उन नेताओं में शामिल थे जिन्हें ‘यंग तुर्क’ कहा जाता था। यह समूह कांग्रेस के भीतर वैचारिक बहस और सुधारों की वकालत करता था। चंद्रशेखर ने बैंक राष्ट्रीयकरण और प्रगतिशील नीतियों का समर्थन किया, लेकिन जब उन्हें लगा कि पार्टी अपने मूल सिद्धांतों से भटक रही है, तो उन्होंने खुलकर विरोध भी किया।

आपातकाल का विरोध

1975 में जब देश में आपातकाल घोषित किया गया, तब चंद्रशेखर ने इसका विरोध किया। वे उन नेताओं में से थे जिन्हें जेल भेजा गया। जेल में बिताए समय ने उनके व्यक्तित्व को और दृढ़ बनाया।आपातकाल के बाद 1977 में जब जनता पार्टी का गठन हुआ, तो चंद्रशेखर इसमें प्रमुख भूमिका में रहे। वे जनता पार्टी के अध्यक्ष भी बने।

जनता पार्टी और वैचारिक संघर्ष

जनता पार्टी सरकार के दौरान आंतरिक मतभेदों के कारण राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न हुई। चंद्रशेखर ने संगठन को एकजुट रखने की कोशिश की, लेकिन वैचारिक और व्यक्तिगत मतभेदों के कारण सरकार अधिक समय तक नहीं चल सकी।उनका मानना था कि राजनीति में सिद्धांतों से समझौता नहीं होना चाहिए। इसी कारण वे अक्सर सत्ता की राजनीति से दूरी बनाते हुए दिखाई दिए।

भारत यात्रा (1983)

चंद्रशेखर के राजनीतिक जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना 1983 की ‘भारत यात्रा’ थी। उन्होंने कन्याकुमारी से दिल्ली तक पैदल यात्रा की, जिसका उद्देश्य देश की सामाजिक और आर्थिक स्थिति को नजदीक से समझना था।इस यात्रा के दौरान उन्होंने किसानों, मजदूरों, युवाओं और वंचित वर्गों की समस्याओं को सुना। यह यात्रा उनके जननायक रूप को स्थापित करने में महत्वपूर्ण रही।

प्रधानमंत्री पद तक की यात्रा

1989 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को बहुमत नहीं मिला और जनता दल के नेतृत्व में सरकार बनी। हालांकि आंतरिक मतभेदों के कारण वी.पी. सिंह सरकार गिर गई।1990 में चंद्रशेखर ने समाजवादी जनता पार्टी (राष्ट्रीय) के नेतृत्व में कांग्रेस के बाहरी समर्थन से सरकार बनाई। 10 नवंबर 1990 को उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।

प्रधानमंत्री के रूप में कार्यकाल (1990–1991)

चंद्रशेखर का कार्यकाल लगभग सात महीनों का था। यह समय आर्थिक संकट और राजनीतिक अस्थिरता का था। भारत गंभीर भुगतान संतुलन (Balance of Payments) संकट से जूझ रहा था। विदेशी मुद्रा भंडार अत्यंत कम हो गया था।उन्होंने आर्थिक संकट से निपटने के लिए कुछ कठोर कदम उठाए। इसी दौरान भारत को अपने स्वर्ण भंडार को गिरवी रखने का निर्णय लेना पड़ा। यह निर्णय कठिन था, लेकिन देश की आर्थिक स्थिति को संभालने के लिए आवश्यक समझा गया।हालांकि कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया, जिसके कारण उनकी सरकार गिर गई।

व्यक्तित्व और नेतृत्व शैली

चंद्रशेखर को स्पष्टवादी और निर्भीक नेता के रूप में जाना जाता था। वे सत्ता से अधिक सिद्धांतों को महत्व देते थे। संसद में उनके भाषण प्रभावशाली और तार्किक होते थे।वे सादगीपूर्ण जीवन जीते थे और आम जनता से सीधे संवाद में विश्वास रखते थे। उनकी भारत यात्रा इसका उदाहरण है।

राजनीतिक विचारधारा

चंद्रशेखर मूलतः समाजवादी विचारधारा के समर्थक थे। वे सामाजिक न्याय, समान अवसर और ग्रामीण विकास के पक्षधर थे।उनका मानना था कि लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब आम आदमी को सत्ता में भागीदारी मिलेगी।

चुनौतियाँ और आलोचनाएँ

प्रधानमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल अल्पकालिक रहा। विपक्ष ने उनकी सरकार को कांग्रेस पर निर्भर होने के कारण कमजोर बताया।आर्थिक संकट और राजनीतिक अस्थिरता के कारण वे बड़े सुधारात्मक कदम नहीं उठा सके।

निजी जीवन

चंद्रशेखर का विवाह दुर्गा देवी से हुआ। उनके दो पुत्र हैं। वे परिवार और राजनीतिक जीवन के बीच संतुलन बनाए रखते थे।

निधन और विरासत

8 जुलाई 2007 को चंद्रशेखर का निधन हुआ। उनके निधन से भारतीय राजनीति ने एक सिद्धांतवादी और स्पष्टवादी नेता को खो दिया।

उनकी विरासत एक ऐसे नेता की है जिसने सत्ता से अधिक विचारधारा को महत्व दिया। उनका जीवन संघर्ष, सादगी और जनसेवा का प्रतीक है।चंद्रशेखर का जीवन भारतीय लोकतंत्र की उस परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें विचार, संघर्ष और जनसेवा सर्वोपरि हैं। भले ही उनका प्रधानमंत्री कार्यकाल छोटा रहा, लेकिन उनका राजनीतिक योगदान और वैचारिक दृढ़ता उन्हें भारतीय राजनीति के इतिहास में विशिष्ट स्थान दिलाती है।उनकी भारत यात्रा, समाजवादी सोच और निर्भीक वक्तव्य आज भी राजनीति में आदर्श माने जाते हैं।

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