INDC Network : बिजनेस, भारत- नई दिल्ली : भारतीय रुपया (INR) ने पिछले आठ महीनों में अमेरिकी डॉलर (USD) के मुकाबले उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की है। 21 दिसंबर 2024 को जहाँ 1 डॉलर की कीमत ₹84.95 थी, वहीं अगस्त 2025 के अंत तक यह बढ़कर लगभग ₹88.17 तक पहुँच गई। इसका मतलब है कि रुपया इस अवधि में करीब ₹3.2 कमजोर हुआ है।
रुपया क्यों कमजोर हो रहा है?
1. अमेरिकी डॉलर की मजबूती
वैश्विक वित्तीय बाजारों में अमेरिकी डॉलर लगातार मजबूत हो रहा है। अमेरिकी फेडरल रिज़र्व की नीतियाँ और उच्च ब्याज दरों ने निवेशकों को डॉलर की ओर आकर्षित किया है। परिणामस्वरूप उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राएँ, जिनमें रुपया भी शामिल है, दबाव में आ गईं।
2. भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव
भारत एक बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का आयात करता है। हाल के महीनों में तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेज़ी आई है, जिससे आयात बिल बढ़ा और चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) पर दबाव पड़ा। इस स्थिति ने रुपया को कमजोर करने में बड़ी भूमिका निभाई।
3. मौद्रिक नीति और RBI का रुख
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने हाल के महीनों में ब्याज दरों में कोई कटौती नहीं की। RBI ने अपनी नीतिगत दर स्थिर रखी, ताकि मुद्रास्फीति पर नियंत्रण रखा जा सके। लेकिन इससे विदेशी निवेशक भारतीय बाज़ारों में ज्यादा आकर्षित नहीं हुए और पूंजी प्रवाह धीमा पड़ा।
4. विदेशी निवेश का उतार-चढ़ाव
अप्रैल और मई 2025 में भारत में विदेशी निवेश (FII) प्रवाह देखा गया, लेकिन जून-जुलाई आते-आते निवेश का रुख कमजोर हो गया। विदेशी निवेशक लगातार बदलते वैश्विक आर्थिक संकेतकों और भू-राजनीतिक तनावों के चलते सतर्क बने हुए हैं।
5. तेल और व्यापार घाटा
कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से भारत का व्यापार घाटा बढ़ा है। भारत का आयात बिल पहले से ही भारी है, ऐसे में महंगा तेल रुपये पर और दबाव डालता है। यह स्थिति विदेशी मुद्रा भंडार पर भी असर डालती है।
दरों की तुलना (Table)
| अवधि | USD → INR दर | प्रमुख कारण |
|---|---|---|
| 21 दिसंबर 2024 | ₹84.95 | सामान्य आर्थिक स्थिति |
| अगस्त 2025 (अब) | ~₹88.17 | डॉलर की मजबूती, तेल की कीमतें, निवेश दबाव |
आगे का परिदृश्य
वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि रुपया आगे और दबाव झेल सकता है। हालांकि, बैंक ऑफ अमेरिका और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थानों का अनुमान है कि अगर विदेशी निवेश बढ़ा और घरेलू आर्थिक नीतियों में सुधार हुआ, तो दिसंबर 2025 तक रुपया फिर से ₹84 प्रति डॉलर के स्तर पर पहुँच सकता है।
इस अनुमान का आधार भारत की आर्थिक मजबूती, डिजिटल निर्यात सेवाओं में बढ़ोतरी और उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाएँ हैं। लेकिन अगर वैश्विक स्तर पर तेल महंगा होता रहा और अमेरिकी डॉलर मजबूत रहा, तो यह लक्ष्य पाना मुश्किल हो सकता है।
पिछले आठ महीनों में रुपये की गिरावट ने आयातकों, उद्योगों और आम जनता को प्रभावित किया है। जहाँ निर्यातकों को कुछ लाभ मिला है, वहीं आम उपभोक्ता को महंगे तेल और आयातित वस्तुओं का सीधा असर झेलना पड़ रहा है। रुपया-डॉलर का यह उतार-चढ़ाव आने वाले महीनों में भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा तय करेगा।


















