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उत्तर प्रदेश : हाईकोर्ट के फैसले से दलित-ओबीसी छात्रों का भविष्य संकट में, चंद्रशेखर ने उठाई मांग

INDC Network : लखनऊ, उत्तर प्रदेश : उत्तर प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों में आरक्षण नीति पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले से विवाद खड़ा हो गया है। हाईकोर्ट ने अनुच्छेद 15(5) के तहत बने विशेष आरक्षण प्रावधान को निरस्त कर दिया है, जिससे दलित और ओबीसी छात्रों का मेडिकल शिक्षा तक पहुंचना मुश्किल हो सकता है। दलित नेता चंद्रशेखर आज़ाद ने इस फैसले का कड़ा विरोध करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से हस्तक्षेप की मांग की है।

उत्तर प्रदेश में मेडिकल कॉलेजों में आरक्षण को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा बनाए गए विशेष ग्रांट कम्पोनेंट के तहत लागू आरक्षण प्रावधान को निरस्त कर दिया है। यह प्रावधान केवल 44 सरकारी और ऑटोनॉमस मेडिकल कॉलेजों में लागू था, जिनमें से 4 मेडिकल कॉलेज – कानपुर, अंबेडकर नगर, झांसी और सहारनपुर – में लगभग 340 सीटें अनुसूचित जाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों के लिए आरक्षित थीं। इस व्यवस्था से गरीब और वंचित तबके के छात्रों को डॉक्टर बनने और समाज में बराबरी हासिल करने का अवसर मिल रहा था।

लेकिन हाईकोर्ट के फैसले से यह विशेष आरक्षण व्यवस्था अब समाप्त हो गई है। कोर्ट ने कहा कि यह प्रावधान असंवैधानिक है और इससे सामाजिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन होता है। कोर्ट का मानना है कि मेडिकल शिक्षा में आरक्षण केवल केंद्र या राज्य सरकार के सामान्य नियमों के तहत ही दिया जा सकता है।

दलित नेता और भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद ने इस फैसले का कड़ा विरोध किया है। उन्होंने कहा कि यह फैसला ऐतिहासिक अन्याय के समान है, क्योंकि यह केवल अमीर और सवर्ण वर्ग को मेडिकल शिक्षा का विशेषाधिकार देगा। गरीब और पिछड़े तबके के छात्रों का सपना अधूरा रह जाएगा। आज़ाद ने यह भी आरोप लगाया कि यह फैसला सामाजिक न्याय और समान अवसरों की गारंटी को कमजोर करेगा।

चंद्रशेखर आज़ाद ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से अपील की है कि वह इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएं। उन्होंने कहा कि अगर यह आरक्षण खत्म होता है तो हजारों दलित और पिछड़े वर्ग के छात्र मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश से वंचित रह जाएंगे।

यह विवाद सिर्फ शिक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय, समानता और संविधान में दिए गए अधिकारों से भी जुड़ा हुआ है। अगर सरकार ने समय रहते कोई कदम नहीं उठाया, तो यह फैसला उत्तर प्रदेश में राजनीतिक और सामाजिक असंतोष को जन्म दे सकता है।

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