INDC Network: जीवनी :-भारत के राजनीतिक इतिहास में विश्वनाथ प्रताप सिंह, जिन्हें सामान्यतः वी. पी. सिंह के नाम से जाना जाता है, एक ऐसे नेता के रूप में याद किए जाते हैं जिन्होंने सत्ता से अधिक सिद्धांतों और सामाजिक न्याय को महत्व दिया। वे भारत के आठवें प्रधानमंत्री थे और उनका कार्यकाल भले ही अल्पकालिक रहा, लेकिन उन्होंने भारतीय राजनीति की दिशा पर गहरा प्रभाव छोड़ा। विशेष रूप से मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने का उनका निर्णय भारतीय समाज और राजनीति में ऐतिहासिक मोड़ साबित हुआ।
प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि
विश्वनाथ प्रताप सिंह का जन्म 25 जून 1931 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में हुआ था। वे एक राजघराने से संबंधित थे और उन्हें मांडा रियासत का उत्तराधिकारी माना जाता था। उनके पिता का नाम राजा बहादुर रामगोपाल सिंह था।उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा इलाहाबाद में प्राप्त की और बाद में पुणे विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा ग्रहण की। वे छात्र जीवन से ही सामाजिक मुद्दों और राजनीति में रुचि रखते थे।
राजनीतिक जीवन की शुरुआत
वी. पी. सिंह ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के माध्यम से राजनीति में प्रवेश किया। 1969 में वे पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य बने। उनकी छवि एक ईमानदार और स्पष्टवादी नेता की थी।1971 में वे लोकसभा सांसद बने और बाद में इंदिरा गांधी सरकार में वाणिज्य मंत्री तथा वित्त मंत्री के रूप में कार्य किया।
वित्त मंत्री के रूप में भूमिका
1984 में राजीव गांधी सरकार में उन्हें वित्त मंत्री बनाया गया। इस पद पर रहते हुए उन्होंने टैक्स चोरी और काले धन के खिलाफ सख्त अभियान चलाया। कई बड़े उद्योगपतियों और कंपनियों पर छापेमारी कर उन्होंने यह संदेश दिया कि कानून सबके लिए समान है।उनकी ईमानदार छवि के कारण वे जनता के बीच लोकप्रिय हो गए, लेकिन इसी कारण उन्हें राजनीतिक विरोध का भी सामना करना पड़ा।
रक्षा मंत्री और बोफोर्स मुद्दा
वित्त मंत्री पद से हटाए जाने के बाद उन्हें रक्षा मंत्री बनाया गया। इसी दौरान बोफोर्स तोप सौदे से संबंधित आरोप सामने आए। वी. पी. सिंह ने इस मामले की जांच की मांग की, जिससे उनकी और सरकार के बीच मतभेद बढ़ गए।अंततः उन्होंने कांग्रेस पार्टी से इस्तीफा दे दिया और जनमोर्चा का गठन किया।
जनता दल और राष्ट्रीय राजनीति
1988 में उन्होंने विभिन्न विपक्षी दलों को मिलाकर जनता दल का गठन किया। 1989 के आम चुनाव में जनता दल ने कांग्रेस को कड़ी टक्कर दी।1989 के चुनाव परिणामों के बाद जनता दल ने भाजपा और वाम दलों के समर्थन से सरकार बनाई और 2 दिसंबर 1989 को वी. पी. सिंह ने भारत के आठवें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली।
प्रधानमंत्री के रूप में कार्यकाल
वी. पी. सिंह का कार्यकाल 1989 से 1990 तक रहा। उनका शासनकाल कई महत्वपूर्ण घटनाओं और निर्णयों के लिए जाना जाता है।
मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करना
7 अगस्त 1990 को उन्होंने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा की। इसके तहत केंद्र सरकार की नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को 27% आरक्षण देने का निर्णय लिया गया।यह निर्णय सामाजिक न्याय की दिशा में ऐतिहासिक कदम था, लेकिन देशभर में व्यापक विरोध और समर्थन दोनों देखने को मिले। कई स्थानों पर आंदोलन और प्रदर्शन हुए।
कश्मीर और आंतरिक सुरक्षा
उनके कार्यकाल में कश्मीर में उग्रवाद की स्थिति गंभीर हो गई थी। सरकार को आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
राम जन्मभूमि आंदोलन
उनके शासनकाल के दौरान राम जन्मभूमि आंदोलन भी तेज हुआ। भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा को बिहार में रोककर गिरफ्तार किया गया, जिससे भाजपा ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया।
सरकार का पतन
भाजपा द्वारा समर्थन वापस लेने के बाद उनकी सरकार अल्पमत में आ गई। 7 नवंबर 1990 को वे लोकसभा में विश्वास मत हार गए और उन्हें प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा।उनके बाद चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने।
व्यक्तित्व और विचारधारा
वी. पी. सिंह सादगीपूर्ण जीवन जीने वाले नेता थे। वे भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रुख और सामाजिक न्याय के पक्षधर माने जाते थे।उनका राजनीतिक दर्शन समान अवसर और सामाजिक समावेशन पर आधारित था।
बाद का जीवन
प्रधानमंत्री पद छोड़ने के बाद भी वे सक्रिय राजनीति में रहे। उन्होंने सामाजिक आंदोलनों और जनहित के मुद्दों पर अपनी आवाज उठाई।उन्हें कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह दूरी नहीं बनाई।27 नवंबर 2008 को उनका निधन हो गया।
विरासत
वी. पी. सिंह की सबसे बड़ी विरासत मंडल आयोग की सिफारिशों का क्रियान्वयन है, जिसने भारतीय समाज में सामाजिक और राजनीतिक समीकरण बदल दिए।उनकी ईमानदार छवि और सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्धता उन्हें भारतीय राजनीति में विशिष्ट स्थान दिलाती है।विश्वनाथ प्रताप सिंह का जीवन सत्ता की राजनीति से अधिक सिद्धांतों और सामाजिक न्याय के प्रति समर्पण की कहानी है। उनका प्रधानमंत्री कार्यकाल भले ही छोटा रहा, लेकिन उनके निर्णयों का प्रभाव आज भी भारतीय समाज और राजनीति में दिखाई देता है।वे एक ऐसे नेता थे जिन्होंने व्यवस्था को चुनौती देने और सामाजिक समानता के लिए खड़े होने का साहस दिखाया।



















