Breaking News !

Mainpuri

विभाज्यता का महासूत्र: भारतीय गणित का आधुनिक चमत्कार और सामाजिक व्यवहार का विज्ञान

INDC Network : मैनपुरी, उत्तर प्रदेश : विभाज्यता का महासूत्र भारतीय गणितज्ञ रत्नेश कुमार की वह अनोखी खोज है, जो किसी भी संख्या की विभाज्यता को सार्वभौमिक तरीके से जांचने की क्षमता देती है। यह केवल गणितीय तकनीक नहीं, बल्कि समाज के नियमों, अनुशासन और मानवीय प्रवृत्तियों का भी दर्पण है। यह सूत्र गणित को रटने से सोचने की प्रक्रिया में बदलता है—सहज पालन, सशर्त पालन और कठोर पालन जैसे सिद्धांतों को संख्याओं और समाज दोनों पर लागू करता है।

SCERT, भारत सरकार, राष्ट्रीय मीडिया और 181 देशों में कॉपीराइट मान्यता के बाद यह सूत्र आधुनिक भारतीय गणित को नए वैश्विक स्तर पर स्थापित कर रहा है।

विभाज्यता का महासूत्र: गणितीय चमत्कार से सामाजिक दर्शन तक

लेखक: रत्नेश कुमार, गणितज्ञ एवं स्वतंत्र शोधकर्ता, मैनपुरी (उ.प्र.)

क्या गणित का एक सरल-सा सूत्र समाज के जटिल प्रश्नों का उत्तर दे सकता है?
क्या एक गणितीय सिद्धांत मानव व्यवहार और सामाजिक व्यवस्था का रूपक बन सकता है?

विभाज्यता का महासूत्र”—भारतीय गणित की आधुनिक खोज—इन्हीं सवालों का अनोखा समाधान प्रस्तुत करता है। यह सूत्र केवल संख्याओं की विभाज्यता जांचने का उपकरण नहीं, बल्कि सोचने, समझने और समाज को संरचित करने का गणितीय दर्शन भी है।

यह सूत्र गणित को “रटने की कला” से “सोचने की शक्ति” में बदल देता है।


विभाज्यता का महासूत्र — परिभाषा और अवधारणा

महासूत्र किसी भी संख्या ru की विभाज्यता को किसी भी Divisor RU के लिए जांचने का सार्वभौमिक तरीका प्रदान करता है।

सूत्र:

(10 – U) × r + (R + 1) × u

यहाँ—

  • RU = भाजक (उदाहरण: 19, जहाँ R = 1 और U = 9)
  • ru = भाज्य (उदाहरण: 38, जहाँ r = 3 और u = 8)

परिभाषा:

यदि भाज्य के इकाई अंक u के (R + 1) गुने को, शेष अंक r के (10 – U) गुने में जोड़ने पर प्राप्त संख्या RU से विभाजित हो जाती है, तो मूल संख्या भी उसी से विभाजित होगी।

यह सरल-सा सूत्र किसी भी संख्या के लिए विभाज्यता का नियम तत्काल बना देता है। यही इसकी बड़ी खूबी है—सरलता में सार्वभौमिकता।


महासूत्र से नियम बनाने के तीन तरीके

यह सूत्र संख्याओं के अनुशासन को तीन वर्गों में बाँटता है, और यही विभाजन समाज के मानव व्यवहार से भी मेल खाता है।


1. सहज पालन — प्राकृतिक अनुशासन

कुछ संख्याएँ बिना किसी अतिरिक्त शर्त के महासूत्र का पालन करती हैं।
उदाहरण: 19

सूत्र: r + 2u
38 के लिए: 3 + 16 = 19 → विभाजित ✔️

सामाजिक समानता:
जैसे कुछ लोग स्वभाव से ही नियमों का पालन करते हैं—बिना दबाव, बिना बाधा।


2. सशर्त पालन — प्रेरणा आधारित अनुशासन

उदाहरण: 18

महासूत्र लागू होता है, पर सह-अभाज्य गुणनखंड बनने की शर्त पर।
इसलिए नियम मिलता है: यदि कोई संख्या 2 और 9 दोनों से विभाजित हो, तो वह 18 से भी विभाजित होगी।

सामाजिक समानता:
कुछ लोग तभी नियम मानते हैं जब उन्हें
▪️ प्रोत्साहन
▪️ लाभ
▪️ या अतिरिक्त कारण
दिया जाए—जैसे सरकारी योजनाएँ।


3. कठोर पालन — दंड आधारित अनुशासन

उदाहरण: 16

यह संख्या न महासूत्र के सामान्य रूप से, न ही सह-अभाज्यता द्वारा नियंत्रित होती है।
इसलिए नियम बनता है: पहले 2 से भाग दें, फिर भागफल यदि 8 से विभाजित हो तो मूल संख्या 16 से विभाजित होगी। सामाजिक समानता: जिन लोगों के लिए कानून, जुर्माना या दंड ही एकमात्र अनुशासन है।


4. गणित से समाज तक — एक गहरा रूपक

महासूत्र मात्र गणित नहीं; यह मानव समाज का दर्पण है। यह तीन मूल प्रवृत्तियाँ बताता है:

(i) सहज अनुशासित व्यक्ति : जैसे अभाज्य संख्याएँ—नियम अपने आप बनते और पालन होते हैं।
(ii) प्रेरणा से चलते व्यक्ति : जिन्हें लाभ, अवसर या तर्क चाहिए—तभी नियम अपनाते हैं।
(iii) दंड से नियंत्रित व्यक्ति : कानून का भय ही जिनका अनुशासन बनता है।

इस प्रकार गणित का यह नियम समाज के लिए भी मार्गदर्शक सिद्ध होता है।


राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय मान्यता — विभाज्यता महासूत्र की उपलब्धियाँ

SCERT, उत्तर प्रदेश द्वारा प्रकाशित : “उद्गम” पुस्तक और पोर्टल में महासूत्र को प्रमुख स्थान मिला— जिसका उद्घाटन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने किया।

भारत सरकार द्वारा कॉपीराइट प्रमाणित

रत्नेश कुमार के तीन सूत्र—
1. विभाज्यता का महासूत्र
2. दशक नियम
3. विभाज्यता का तीव्रतम महासूत्र

भारत सरकार द्वारा पंजीकृत हैं और 181 देशों में मान्य हैं।

राष्ट्रीय मीडिया कवरेज: सूत्र को सराहा गया— ऑल इंडिया रेडियो, आज तक डिजिटल, मानव टुडे, एजुकेशनल मिरर, राष्ट्र की बात, टॉक टाइम सहित कई राष्ट्रीय दैनिकों द्वारा।

100+ संगोष्ठियाँ और प्रस्तुतियाँ : चितकारा यूनिवर्सिटी (हिमाचल), सीमैट प्रयागराज सहित देशभर में शैक्षिक मंचों पर व्यापक चर्चा और प्रशिक्षण।

नया कॉपीराइट: “सबसे छोटी संख्याएँ लिखने के रत्नेश के तर्क” भी भारत सरकार द्वारा पंजीकृत।


प्रेरक अनुभव — बच्चों की सोच में क्रांतिकारी बदलाव

पहले बच्चे केवल 2, 3, 5 जैसे छोटे नियम जानते थे। लेकिन महासूत्र सीखने के बाद— अब बच्चे 97, 121, यहाँ तक कि 999 तक की संख्याओं के लिए खुद नियम बनाते हैं। उनका भय समाप्त, तर्कशक्ति विकसित, आत्मविश्वास बढ़ा, गणित में स्वाभाविक रुचि पैदा हुई

यह सूत्र डिजिटल इंडिया की शिक्षा नीति के अनुरूप Algorithmic Thinking और Calculator-Free Analysis विकसित करता है। कई शिक्षाविदों ने इसे “Indian Logic Pattern for Divisibility Analysis” कहा है।


निष्कर्ष — गणित का भविष्य और समाज का मार्गदर्शन

विभाज्यता का महासूत्र” सिर्फ गणित का सिद्धांत नहीं— यह तर्क, अनुशासन और समरसता का दर्शन है।

जैसे संख्याओं के व्यवहार को समझकर सार्वभौमिक नियम बनाए गए, वैसे ही मनुष्यों की प्रवृत्तियों का अध्ययन कर समाज के लिए—
▪️ सहज
▪️ व्यावहारिक
▪️ और प्रभावी
नियम बनाए जा सकते हैं।

यह खोज भारतीय गणित की आध्यात्मिक व तार्किक परंपरा को फिर से विश्व मंच पर स्थापित करने की क्षमता रखती है।जैसे वैदिक गणित ने तेज गणना दी— वैसे ही विभाज्यता का महासूत्र गणित समझने की गहराई प्रदान करता है।

What's your reaction?

Related Posts

1 of 8

Leave A Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *