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हिमंत बिस्व सरमा मामले पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

INDC Network: सुप्रीम कोर्ट , नई दिल्ली,भारत:-सीजेआई ने कहा—चुनाव में सुप्रीम कोर्ट न बने राजनीतिक अखाड़ाअसम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा की कथित विवादित स्पीच और सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर दाखिल याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से पहले याचिकाकर्ताओं को हाईकोर्ट जाने की सलाह दी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि हर चुनाव के दौरान सुप्रीम कोर्ट को राजनीतिक मंच बनाना उचित नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक हाईकोर्ट के अधिकारों का उपयोग नहीं किया जाता, सीधे सुप्रीम कोर्ट आना सही परंपरा नहीं है।

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा की कथित विवादित भाषण और सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। उन्होंने याचिकाकर्ताओं से सवाल किया कि वे सीधे सुप्रीम कोर्ट क्यों पहुंचे, जबकि इस मामले में पहले संबंधित हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया जा सकता था।सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि यह एक नया चलन बनता जा रहा है कि जैसे ही किसी राज्य में चुनाव का माहौल बनता है, सुप्रीम कोर्ट को राजनीतिक विवादों का केंद्र बना दिया जाता है। मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सुप्रीम कोर्ट को “राजनीतिक युद्ध का मैदान” नहीं बनाया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट जाने की सलाह

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि यह मामला अनुच्छेद 32 के तहत सुनवाई योग्य है, क्योंकि यह एक समुदाय विशेष को निशाना बनाने और नफरत फैलाने का मुद्दा है। उन्होंने एसआईटी (विशेष जांच दल) के गठन की मांग भी की।इस पर सीजेआई ने कहा कि हाईकोर्ट में भी सक्षम और अनुभवी जज मौजूद हैं। उन्होंने पूछा कि आखिर हाईकोर्ट जाने में क्या दिक्कत है। अदालत ने दोहराया कि जब तक कोई असाधारण परिस्थिति न हो, पहले संबंधित हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की जानी चाहिए।जब याचिकाकर्ता पक्ष ने यह तर्क दिया कि यह पूरे देश से जुड़ा मुद्दा है, तब मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “क्या देश की हर घटना पर सुप्रीम कोर्ट ही सुनवाई करेगा?” उन्होंने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट हर मामले में सीधे हस्तक्षेप नहीं कर सकता।

राजनीतिक संदर्भ पर टिप्पणी

सुनवाई के दौरान सीजेआई ने कहा कि चुनावी समय में अदालतों का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि अदालत राजनीतिक दलों से संयम बरतने और संवैधानिक मर्यादा के भीतर रहने की अपील करती है, लेकिन हर चुनावी बयान या पोस्ट को लेकर सीधे सुप्रीम कोर्ट आना सही परंपरा नहीं है।जब वकील ने आग्रह किया कि अगर मामला हाईकोर्ट भेजा जाए तो असम हाईकोर्ट के बजाय किसी अन्य राज्य के हाईकोर्ट को सौंपा जाए, तो सीजेआई ने इसे “बहुत गलत मांग” बताते हुए खारिज कर दिया।

अवमानना और एफआईआर का मुद्दा

याचिकाकर्ता के एक अन्य वकील ने तर्क दिया कि हेट स्पीच से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट पहले भी अवमानना याचिकाएं सुन चुका है। इस पर सीजेआई ने स्पष्ट किया कि वर्तमान मामले में कोई अवमानना याचिका नहीं है और सीधे सुप्रीम कोर्ट आना उचित नहीं है।सुनवाई के दौरान यह भी बताया गया कि असम सीएम के खिलाफ विभिन्न राज्यों में एफआईआर दर्ज हुई हैं। इस पर कोर्ट ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ एफआईआर हुई है, तो वही व्यक्ति उचित मंच पर राहत के लिए आ सकता है। कोर्ट ने साफ किया कि वह इस मामले को जनहित याचिका (PIL) के रूप में नहीं सुनेगा।

विवाद की पृष्ठभूमि

हाल ही में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर असम बीजेपी के आधिकारिक पेज से एक वीडियो साझा किया गया था, जिसमें मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा कथित रूप से राइफल के साथ नजर आ रहे थे। बाद में यह वीडियो हटा लिया गया। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि उनके भाषण और पोस्ट के जरिए धर्म, भाषा और जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव को बढ़ावा दिया गया।हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस चरण पर मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की और प्रक्रिया संबंधी पहलुओं पर ही जोर दिया।

क्रमांकविषयविवरण
1मामलाहिमंत बिस्व सरमा की स्पीच व पोस्ट पर याचिका
2अदालतसुप्रीम कोर्ट
3मुख्य टिप्पणीपहले हाईकोर्ट जाएं
4कानूनी आधारअनुच्छेद 32 की दलील
5मांगएसआईटी गठन
6कोर्ट का रुखसुप्रीम कोर्ट को राजनीतिक मंच न बनाएं
7विवादकथित हेट स्पीच और सोशल मीडिया पोस्ट

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी न्यायिक प्रक्रिया की मर्यादा और संस्थागत संतुलन को रेखांकित करती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि संवैधानिक ढांचे में हाईकोर्ट की भी महत्वपूर्ण भूमिका है और हर राजनीतिक विवाद को सीधे सर्वोच्च न्यायालय में लाना उचित नहीं है। अब यह देखना होगा कि याचिकाकर्ता हाईकोर्ट का रुख करते हैं या आगे कोई अन्य कानूनी कदम उठाते हैं।


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