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एडोल्फ हिटलर बर्बादी का बादशाह : बचपन से नाजी तानाशाह बनने और अंत तक

एडोल्फ हिटलर की पूरी जीवनी पढ़िए—उसका बचपन, प्रथम विश्व युद्ध में भूमिका, नाजी पार्टी का नेतृत्व, सत्ता तक पहुंचने की कहानी, जर्मनी में तानाशाही, यहूदी-विरोधी नीतियां, होलोकॉस्ट, द्वितीय विश्व युद्ध और 1945 में उसकी मृत्यु तक की पूरी कहानी।
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एडोल्फ हिटलर बर्बादी का बादशाह : बचपन से नाजी तानाशाह बनने और अंत तक
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एडोल्फ हिटलर 20वीं सदी के सबसे विवादास्पद और विनाशकारी राजनीतिक नेताओं में से एक था। वह नाजी पार्टी का नेता और 1933 से 1945 तक नाजी जर्मनी का तानाशाह रहा। उसके शासन में जर्मनी ने लोकतंत्र को खत्म कर एक दमनकारी एकदलीय तानाशाही स्थापित की। हिटलर की नस्लवादी और यहूदी-विरोधी विचारधारा ने यूरोप में बड़े पैमाने पर उत्पीड़न और नरसंहार को जन्म दिया। उसके शासन और नाजी व्यवस्था के कारण होलोकॉस्ट में लगभग 60 लाख यहूदियों की हत्या की गई और द्वितीय विश्व युद्ध में भी करोड़ों लोगों की जान गई।

एडोल्फ हिटलर का जन्म 20 अप्रैल 1889 को ऑस्ट्रिया के ब्राउनाउ एम इन नामक शहर में हुआ था। उसके पिता का नाम एलोइस हिटलर था, जो सरकारी कर्मचारी थे, जबकि उसकी मां का नाम क्लारा हिटलर था। परिवार बाद में लिंज चला गया। किशोरावस्था में हिटलर की कला में रुचि थी और वह चित्रकार बनना चाहता था। उसने वियना की कला अकादमी में प्रवेश पाने की कोशिश की, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली। बाद में वह वियना में गरीबी और अस्थिर परिस्थितियों में रहा।

1913 में हिटलर म्यूनिख चला गया। अगले वर्ष प्रथम विश्व युद्ध शुरू होने पर उसने जर्मन सेना में भर्ती होकर पश्चिमी मोर्चे पर सेवा की। युद्ध के दौरान वह घायल हुआ और उसे सैन्य सम्मान भी मिले। 1918 में मस्टर्ड गैस के हमले के बाद उसकी आंखों की रोशनी अस्थायी रूप से प्रभावित हुई और वह अस्पताल में भर्ती हुआ। उसी दौरान उसे जर्मनी के युद्धविराम और हार की खबर मिली। युद्ध की समाप्ति के बाद वह म्यूनिख लौट आया।

प्रथम विश्व युद्ध के बाद जर्मनी में राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता थी। इसी वातावरण में हिटलर का राजनीतिक प्रभाव बढ़ने लगा। 1919 में वह जर्मन वर्कर्स पार्टी से जुड़ा, जो बाद में नेशनल सोशलिस्ट जर्मन वर्कर्स पार्टी यानी नाजी पार्टी बनी। हिटलर एक प्रभावशाली वक्ता था और उसने उग्र राष्ट्रवाद, यहूदी-विरोध, साम्यवाद-विरोध और नस्लीय विचारधारा को अपने राजनीतिक भाषणों का आधार बनाया। 1921 तक वह नाजी पार्टी का प्रमुख नेता बन चुका था।

1923 में हिटलर ने जर्मन सरकार को सत्ता से हटाने के लिए बीयर हॉल पुट्श नामक असफल प्रयास किया। विद्रोह विफल होने के बाद उसे गिरफ्तार किया गया और राजद्रोह के मामले में सजा मिली। जेल में रहते हुए उसने अपनी राजनीतिक विचारधारा को पुस्तक ‘Mein Kampf’ (माइन काम्फ) में प्रस्तुत किया। इस पुस्तक में उसने नस्लीय श्रेष्ठता, यहूदी-विरोध, तानाशाही, सैन्य विस्तार और जर्मनी के लिए पूर्वी यूरोप में ‘Lebensraum’ यानी ‘जीवित रहने के लिए क्षेत्र’ जैसी विस्तारवादी अवधारणाओं का समर्थन किया।

जेल से रिहा होने के बाद हिटलर ने सत्ता हासिल करने की रणनीति बदली। उसने सीधे विद्रोह के बजाय चुनाव और राजनीतिक गठजोड़ के माध्यम से सत्ता तक पहुंचने की कोशिश की। 1920 के दशक के अंत और 1930 के दशक की शुरुआत में जर्मनी आर्थिक संकट, बेरोजगारी और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा था। नाजी पार्टी ने प्रचार, राजनीतिक हिंसा और राष्ट्रवादी नारों के जरिए अपना समर्थन बढ़ाया। 1932 के चुनावों के बाद भी हिटलर को सीधे जनता ने चांसलर के पद पर नहीं चुना था। 30 जनवरी 1933 को राष्ट्रपति पॉल फॉन हिंडनबर्ग ने हिटलर को जर्मनी का चांसलर नियुक्त किया।

सत्ता में आने के बाद हिटलर ने बहुत तेजी से लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर किया। फरवरी 1933 की राइखस्टाग आग के बाद नागरिक स्वतंत्रताओं पर प्रतिबंध लगाए गए। मार्च 1933 में पारित Enabling Act ने हिटलर की सरकार को संसद की सामान्य प्रक्रिया से अलग कानून बनाने की व्यापक शक्ति दे दी। इसके बाद राजनीतिक विरोधियों, ट्रेड यूनियनों और स्वतंत्र संस्थाओं पर कार्रवाई बढ़ी और जर्मनी एकदलीय तानाशाही में बदल गया।

1934 में राष्ट्रपति हिंडनबर्ग की मृत्यु के बाद हिटलर ने राष्ट्रपति और चांसलर के पदों की शक्तियों को अपने हाथ में केंद्रित कर लिया और खुद को Führer घोषित किया। सेना तथा सरकारी अधिकारियों से उसके प्रति व्यक्तिगत निष्ठा की शपथ ली गई। इस तरह हिटलर की व्यक्तिगत तानाशाही और मजबूत हो गई।

हिटलर की विचारधारा का सबसे भयावह पहलू उसका नस्लवादी और यहूदी-विरोधी अभियान था। नाजी सरकार ने यहूदियों को धीरे-धीरे नागरिक अधिकारों से वंचित किया और उन्हें समाज से अलग करने के लिए अनेक कानून बनाए। 1935 के न्यूरेंबर्ग कानूनों ने यहूदियों के नागरिक अधिकारों को गंभीर रूप से सीमित कर दिया। नवंबर 1938 में क्रिस्टलनाख्ट के दौरान यहूदी दुकानों, घरों और धार्मिक स्थलों पर व्यापक हमले हुए। इसके बाद उत्पीड़न और अधिक संगठित तथा हिंसक होता गया।

1939 में हिटलर के नेतृत्व में जर्मनी ने पोलैंड पर हमला किया। इसके बाद यूरोप में द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ। जर्मन सेना ने शुरुआती वर्षों में यूरोप के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया। लेकिन सोवियत संघ पर जर्मन आक्रमण, उत्तरी अफ्रीका और पश्चिमी मोर्चे पर संघर्ष तथा अमेरिका के युद्ध में प्रवेश के बाद जर्मनी की स्थिति धीरे-धीरे कमजोर होने लगी।

युद्ध के दौरान नाजी शासन ने यहूदियों और अन्य लक्षित समूहों के खिलाफ व्यवस्थित नरसंहार को तेज किया। होलोकॉस्ट के दौरान लगभग 60 लाख यूरोपीय यहूदियों की हत्या की गई। इसके अलावा रोमा समुदाय, विकलांग लोग, सोवियत युद्धबंदी, पोलिश नागरिक, समलैंगिक लोग, राजनीतिक विरोधी और अन्य समूह भी नाजी उत्पीड़न और हिंसा का शिकार हुए। इतिहासकारों के अनुसार होलोकॉस्ट को केवल हिटलर के व्यक्तिगत आदेशों तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता; नाजी नेतृत्व, प्रशासनिक संस्थाओं और बड़ी संख्या में सहयोगियों ने इसे लागू करने में भूमिका निभाई।

1942 के बाद युद्ध का रुख जर्मनी के खिलाफ तेजी से बदलने लगा। सोवियत सेना ने पूर्वी मोर्चे पर जर्मन सेना को पीछे धकेला, जबकि पश्चिम में मित्र देशों की सेनाएं आगे बढ़ रही थीं। जून 1944 में नॉर्मंडी में मित्र देशों के उतरने के बाद पश्चिमी मोर्चे पर भी जर्मनी पर दबाव बढ़ गया। 1945 की शुरुआत तक सोवियत सेना बर्लिन की ओर बढ़ रही थी और नाजी जर्मनी की हार लगभग निश्चित हो चुकी थी।

अप्रैल 1945 में सोवियत सेनाएं बर्लिन के करीब पहुंच गईं। हिटलर बर्लिन स्थित फ्यूहररबंकर में रहने लगा। 29 अप्रैल 1945 को उसने ईवा ब्राउन से विवाह किया। अगले दिन, 30 अप्रैल 1945, हिटलर ने आत्महत्या कर ली। ईवा ब्राउन ने भी आत्महत्या की। इसके बाद नाजी जर्मनी का पतन तेजी से हुआ और 8 मई 1945 को जर्मनी ने बिना शर्त आत्मसमर्पण कर दिया।

हिटलर की मृत्यु के बाद उसका शासन समाप्त हो गया, लेकिन उसके अपराधों की छाप विश्व इतिहास पर गहरी रही। नाजी शासन, होलोकॉस्ट और द्वितीय विश्व युद्ध ने मानवता को यह दिखाया कि नस्लीय घृणा, कट्टर राष्ट्रवाद, राजनीतिक दमन, प्रचार और लोकतांत्रिक संस्थाओं के कमजोर होने का परिणाम कितना विनाशकारी हो सकता है।

हिटलर की जीवनी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल एक व्यक्ति के जीवन की कहानी नहीं है। यह इस बात का भी अध्ययन है कि आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता, सामाजिक असंतोष और नफरत फैलाने वाली विचारधारा किस तरह लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर कर सकती है। हिटलर का सत्ता तक पहुंचना किसी एक घटना का परिणाम नहीं था; इसमें राजनीतिक परिस्थितियों, आर्थिक संकट, नाजी प्रचार, हिंसा, राजनीतिक सौदों और अन्य सामाजिक कारकों की भूमिका थी।