उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड में अनुसूचित जाति (SC) समुदाय से दो व्यक्ति भारत के मुख्य न्यायाधीश बने हैं। इनमें न्यायमूर्ति के.जी. बालाकृष्णन और न्यायमूर्ति बी.आर. गवई शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार न्यायमूर्ति के.जी. बालाकृष्णन ने 2007 से 2010 तक CJI के रूप में कार्य किया।
इस हिसाब से 53 CJI में SC समुदाय से जुड़े CJI की संख्या 2 रही है। वहीं उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड में ST और OBC समुदाय से किसी CJI का प्रमाणित उल्लेख नहीं मिलता। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि सरकार द्वारा आधिकारिक रूप से ST और OBC के लिए संख्या 'शून्य' घोषित की गई है। केंद्र सरकार के अनुसार संविधान के अनुच्छेद 124, 217 और 224 में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए जाति या वर्ग आधारित आरक्षण का प्रावधान नहीं है। सरकार ने यह भी कहा है कि उच्च न्यायपालिका में सामाजिक विविधता सुनिश्चित करने के लिए संबंधित उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों से SC, ST, OBC, अल्पसंख्यक और महिला वर्ग के योग्य उम्मीदवारों पर उचित विचार करने का अनुरोध किया जाता है।
आंकड़ा क्या बताता है?
यदि केवल CJI पद को देखा जाए तो 53 मुख्य न्यायाधीशों में सार्वजनिक रूप से पहचाने जाने वाले SC समुदाय के CJI केवल 2 हैं। इसका मतलब यह है कि CJI पद पर SC प्रतिनिधित्व करीब 3.8 प्रतिशत रहा है। वहीं ST और OBC समुदाय के CJI की संख्या के संबंध में कोई आधिकारिक केंद्रीय जातिवार डेटाबेस उपलब्ध नहीं है।
यह आंकड़ा न्यायपालिका में प्रतिनिधित्व को लेकर महत्वपूर्ण सवाल जरूर खड़ा करता है कि भारत जैसे सामाजिक रूप से विविध देश में उच्चतम न्यायिक पदों पर विभिन्न सामाजिक समुदायों की भागीदारी किस स्तर तक रही है। हालांकि, CJI की संख्या को पूरे सुप्रीम कोर्ट या पूरी न्यायपालिका का प्रतिनिधित्व मानना भी सही नहीं होगा। CJI केवल एक पद है और सुप्रीम कोर्ट के अन्य न्यायाधीशों तथा हाई कोर्ट के न्यायाधीशों की सामाजिक पृष्ठभूमि अलग-अलग हो सकती है।
सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार 2018 के बाद हाई कोर्ट के न्यायाधीशों की सामाजिक पृष्ठभूमि का डेटा जुटाया जाना शुरू हुआ। इससे पहले इस तरह का केंद्रीय श्रेणीवार डेटा नियमित रूप से उपलब्ध नहीं था।
आरक्षण की मांग क्यों उठती है?
न्यायपालिका में सामाजिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने के समर्थकों का तर्क है कि देश की विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमियों को न्यायिक संस्थानों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। उनके अनुसार SC, ST और OBC समुदायों के लिए संस्थागत प्रतिनिधित्व के उपायों पर विचार किया जाना चाहिए।
वहीं वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति में आरक्षण का प्रावधान नहीं है और नियुक्तियां कॉलेजियम प्रक्रिया के माध्यम से होती हैं। इसलिए न्यायपालिका में आरक्षण लागू करने का प्रश्न संवैधानिक और संस्थागत बदलाव से जुड़ा विषय है।
इसलिए 53 CJI का आंकड़ा न्यायपालिका में सामाजिक प्रतिनिधित्व की चर्चा का एक महत्वपूर्ण तथ्य है, लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि बाकी 51 CJI आधिकारिक रूप से 'General' वर्ग के थे। उपलब्ध आंकड़ों को इसी सीमा के साथ देखना जरूरी है।
Source :
https://www.sci.gov.in/former-chief-justice-judges/
https://sansad.in/getFile/annex/270/AU2357_KpW21l.pdf